माँ ब्रह्मचारिणी, माता के द्वितीय स्वरूप ब्रह्मचारिणी का महत्व और शक्तियां

माँ ब्रह्मचारिणी (Maa Brahmacharini): माँ ब्रह्मचारिणी का माता दुर्गा के नौ रूपों में दूसरा स्वरूप माना जाता है। इसलिए ब्रह्मचारिणी देवी को द्वितीय दुर्गा के रूप में पूजा जाता है। नवदुर्गाओं में यही दूसरी दुर्गा हैं। इस स्वरुप में माता ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए बिना अन्न और जल के 5000 वर्षों तक घोर तपस्या की, जिसके कारण माता के इस स्वरुप को  ‘ब्रह्मचारिणी’ कहा जाता है।

माँ ब्रह्मचारिणी (Maa Brahmacharini), महत्व और शक्तियां

माँ ब्रह्मचारिणी
Maa Brahmacharini

नवरात्रि का दूसरा दिन

देवी पुराण के अनुसार ब्रह्मचारिणी माता सदैव तपस्या में लीन देवी हैं जिसकी वजह से उनके तप तेज की  तीव्रता बढ़ गई और ये गौर वर्ण की हो गयी । शब्द विग्रह, ‘ब्रह्मा’ का अर्थ है तपस्या, एक स्वयंभू आत्मा, पूर्ण वास्तविक और शुद्ध ज्ञान। ‘चारिणी’ का अर्थ है आचरण करना, पालन करना और व्यवहार करना। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ है तपस्या करने वाली

नवरात्रि पूजा के दूसरे दिन इनकी ही उपासना और आराधना की जाती है। माँ दुर्गा के इस स्वरुप के दाहिने हाथ में जप की माला है और बाये हाथ में कमंडलु सुशोभित है।

दूसरे दिन की पूजा में योगी अपने मन को ‘स्वाधिष्ठान’ चक्र में स्थापित करते हैं। यह  उनकी योग साधना का दूसरा दिन होता है। इसके सिद्ध होने से जल तत्व का पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है।

ब्रह्मचारिणी का मंत्र

या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

माता के इस स्वरुप की आराधना से व्यक्ति के जीवन मे संयम, सदाचार, आत्मविश्वास, तेज, बल व सात्विक बुद्धि का विकास निरंतर होता रहता है, तथा अविवेक, असंतोष, लोभ आदि दुर्गुणों का अंत होता। जीवन में उत्साह, धैर्य व साहस में बढ़ोत्तरी होती है। व्यक्ति अपने कर्मों के प्रति ईमानदार और सजग हो जाता है।

किंवदंती

पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख है कि ब्रह्मचारिणी माता का जन्म हिमालय राज पर्वत के यहाँ हुआ था। जिनकी माता का नाम मैना था। हिमालय के यहाँ घूमते हुए एक दिन ऋषि श्री नारद जी महाराज पहुंचे,  महाराज हिमालय द्वारा नारद ऋषि के आगमन पर उनका भव्य स्वागत किया गया। सभी परिस्थितियों को जानने के बाद, हिमालय राज ने देवऋषि से, लड़की के भविष्य के बारे में जानने की उत्सुकता व्यक्त की। 

नारद जी ने कन्या का हाथ देखकर उसके भावी जीवन की सारी दशा हिमालय राज को बता दी। लेकिन वैवाहिक जीवन में रुकावट की स्थिति सुनकर उसकी मां रोने लगी और देवऋषि नारद के जाने के बाद अपने पति से पूछती है कि इस लड़की का क्या हाल होगा, इसे कैसा पति मिलेगा? देवऋषि ने ये क्या कह दिया ?

फिर महाराज हिमालय ने उन्हें पूरी स्थिति बतायी, और कहा देवऋषि नारद जी ने कन्या के वैवाहिक जीवन की सुगमता और समस्याओं से मुक्ति के लिए व्रत और तपस्या का मार्ग सुझाया है। नारद जी के सुझाये अनुसार कन्या ने व्रत और तपस्या प्रारंभ किया और उसमें लीन हो, हजारों वर्षों तक कठोर तपस्या की। 

जिसका वर्णन गोस्वामी तुलसी दास ने श्री राम चरित्र मानस में इस प्रकार किया है –

कछु दिन भोजन वारि बतासा।
कीन्ह कछुक दिन कठिन उपवासा।।

यानी इतनी कठोर तपस्या और उपवास के कारण भगवान ब्रह्मा को देव समुदाय के साथ खुश होकर जाना पड़ा। जिसमें ब्रह्मा जी ने शिव को पति रूप में पाने का वरदान दिया, जिससे उन्हें पति के रूप में अविनाशी भगवान शिव की प्राप्ति हुई।

माँ दुर्गा के अन्य स्वरुप

माता शैलपुत्री | माता चंद्रघंटा  |  कूष्माण्डा मातास्कंदमातामाता कात्यायनी | माता कालरात्रि  |  माता महागौरीमाता सिद्धिदात्री